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गुजरे पल

अनमोल पल

विचारों की धारा

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वेद–पुराण

ऋचाओं की साँस में,

अब भी काँपता है ,

पहला प्रश्न क्या था,

जब कुछ भी नहीं था?

अग्नि ने,

मंत्रों से पहले मौन सीखा,

आकाश ने,

शब्दों से पहले अर्थ माँगा।

वेद—

अँधेरों से पहले जले दीप,

समय की हथेली पर रखे,

अनबुझे सत्य।

ऋषि की बंद पलकों में

छंद नहीं, संयम था,

जो कहा नहीं जा सकता,

वही कहा गया,

धीरे,शुद्ध,अनश्वर।

पुराणों ने कथा ओढ़ी,

कथा ने जीवन सीखा,

देव और दानव के बीच,

मनुष्य ने अपना,

भार पहचाना।

राम—

मर्यादा की

पतली रेखा,

कृष्ण—

लीला में लिपटा

गूढ़ उत्तर,

शिव—

मौन का सबसे

ऊँचा वाक्य।

हर युग ने पूछा,

हर युग ने सुना,

उत्तर बदले नहीं,

केवल कहने की,

भाषा बदली।

वेद—

बीज हैं चेतना के,

पुराण—

अनुभव की

फैलती छाया,

एक ने दिशा दिखाई,

दूसरे ने

चलते रहना सिखाया।

आज भी

जब शब्द थक जाते हैं,

और अर्थ रूठ जाता है,

वेद–पुराण,

चुपचाप याद दिलाते हैं

कि सत्य कभी भी,

शोर नहीं करता।

Capt. Satish K.Chohan

skc7online@gmail.com

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