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Satish Kumar's avatar

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गुजरे पल

अनमोल पल

विचारों की धारा

Thanks.

Satish Kumar's avatar

वेद–पुराण

ऋचाओं की साँस में,

अब भी काँपता है ,

पहला प्रश्न क्या था,

जब कुछ भी नहीं था?

अग्नि ने,

मंत्रों से पहले मौन सीखा,

आकाश ने,

शब्दों से पहले अर्थ माँगा।

वेद—

अँधेरों से पहले जले दीप,

समय की हथेली पर रखे,

अनबुझे सत्य।

ऋषि की बंद पलकों में

छंद नहीं, संयम था,

जो कहा नहीं जा सकता,

वही कहा गया,

धीरे,शुद्ध,अनश्वर।

पुराणों ने कथा ओढ़ी,

कथा ने जीवन सीखा,

देव और दानव के बीच,

मनुष्य ने अपना,

भार पहचाना।

राम—

मर्यादा की

पतली रेखा,

कृष्ण—

लीला में लिपटा

गूढ़ उत्तर,

शिव—

मौन का सबसे

ऊँचा वाक्य।

हर युग ने पूछा,

हर युग ने सुना,

उत्तर बदले नहीं,

केवल कहने की,

भाषा बदली।

वेद—

बीज हैं चेतना के,

पुराण—

अनुभव की

फैलती छाया,

एक ने दिशा दिखाई,

दूसरे ने

चलते रहना सिखाया।

आज भी

जब शब्द थक जाते हैं,

और अर्थ रूठ जाता है,

वेद–पुराण,

चुपचाप याद दिलाते हैं

कि सत्य कभी भी,

शोर नहीं करता।

Capt. Satish K.Chohan

skc7online@gmail.com

Satish Kumar's avatar

मुस्कराते अधर

वो शब्द तो कतई ना था,

बस मुस्कराते अधरों के,

बीच हल्की-सी दरार थी,

पर उस मुस्कान के पीछे

छुपी हुई इक तलवार थी।

कुछ कहा भी नहीं उसने,

न ही आवाज़ उठाई थी,

बस आँखों की चुप,

भाषा में केवल चमकी,

तीखी सी झंकार थी।

धीमे-धीमे से आता है,

रेशमी आवरण ओढ़े,

पर भीतर तक उतर जाए

ऐसी उसकी मार थी।

हँसी में भीगकर निकला,

तीर-सा एक वाक्य था,

बिन कोई भी रक्त गिराए

देता गहरा-सा प्रहार था।

सभा हो या संबंधों की

चौखट या मन का आईना,

हर जगह उसका होना

जैसे सच का विस्तार था।

शब्दों में थोड़ा नमक,

लहजे में हल्की आग,

पर उसी में छुपा कहीं,

उपचार का सार था।

संयम में हो तो संकेत,

मर्यादा की सीख बने,

क्रोध में आए तो केवल

अपमान का भार था।

प्रेम में घुल जाए यदि,

शरारत-सा खिल उठे,

चुभन में भी अपनापन,

मीठा-सा व्यवहार था।

कटाक्ष वही जो सच,

कह दे बिन शोर किए,

वरना हर व्यंग्य तो बस,

शब्दों का व्यापार था।

Archana Sharma's avatar

Please share few writing pieces close to your heart.

Satish Kumar's avatar

वेद–पुराण

ऋचाओं की साँस में,

अब भी काँपता है ,

पहला प्रश्न क्या था,

जब कुछ भी नहीं था?

अग्नि ने,

मंत्रों से पहले मौन सीखा,

आकाश ने,

शब्दों से पहले अर्थ माँगा।

वेद—

अँधेरों से पहले जले दीप,

समय की हथेली पर रखे,

अनबुझे सत्य।

ऋषि की बंद पलकों में

छंद नहीं, संयम था,

जो कहा नहीं जा सकता,

वही कहा गया,

धीरे,शुद्ध,अनश्वर।

पुराणों ने कथा ओढ़ी,

कथा ने जीवन सीखा,

देव और दानव के बीच,

मनुष्य ने अपना,

भार पहचाना।

राम—

मर्यादा की

पतली रेखा,

कृष्ण—

लीला में लिपटा

गूढ़ उत्तर,

शिव—

मौन का सबसे

ऊँचा वाक्य।

हर युग ने पूछा,

हर युग ने सुना,

उत्तर बदले नहीं,

केवल कहने की,

भाषा बदली।

वेद—

बीज हैं चेतना के,

पुराण—

अनुभव की

फैलती छाया,

एक ने दिशा दिखाई,

दूसरे ने

चलते रहना सिखाया।

आज भी

जब शब्द थक जाते हैं,

और अर्थ रूठ जाता है,

वेद–पुराण,

चुपचाप याद दिलाते हैं

कि सत्य कभी भी,

शोर नहीं करता।

Capt. Satish K.Chohan

skc7online@gmail.com

Aubrey Lunn's avatar

You are a wonderful person and consider your age, you are super human. Do you use rhyming couplets in your poems?.

Satish Kumar's avatar

वेद–पुराण

ऋचाओं की साँस में,

अब भी काँपता है ,

पहला प्रश्न क्या था,

जब कुछ भी नहीं था?

अग्नि ने,

मंत्रों से पहले मौन सीखा,

आकाश ने,

शब्दों से पहले अर्थ माँगा।

वेद—

अँधेरों से पहले जले दीप,

समय की हथेली पर रखे,

अनबुझे सत्य।

ऋषि की बंद पलकों में

छंद नहीं, संयम था,

जो कहा नहीं जा सकता,

वही कहा गया,

धीरे,शुद्ध,अनश्वर।

पुराणों ने कथा ओढ़ी,

कथा ने जीवन सीखा,

देव और दानव के बीच,

मनुष्य ने अपना,

भार पहचाना।

राम—

मर्यादा की

पतली रेखा,

कृष्ण—

लीला में लिपटा

गूढ़ उत्तर,

शिव—

मौन का सबसे

ऊँचा वाक्य।

हर युग ने पूछा,

हर युग ने सुना,

उत्तर बदले नहीं,

केवल कहने की,

भाषा बदली।

वेद—

बीज हैं चेतना के,

पुराण—

अनुभव की

फैलती छाया,

एक ने दिशा दिखाई,

दूसरे ने

चलते रहना सिखाया।

आज भी

जब शब्द थक जाते हैं,

और अर्थ रूठ जाता है,

वेद–पुराण,

चुपचाप याद दिलाते हैं

कि सत्य कभी भी,

शोर नहीं करता।

Capt. Satish K.Chohan

skc7online@gmail.com